मूत्र निर्माण

‌● मूत्र निर्माण के तीन मुख्य प्रक्रिया सम्मिलित है



1• गुच्छीय निस्यंदन( ट्यूबलर फिल्ट्रेशन) - मूत्र निर्माण के प्रथम चरण मे केशिकागुच्छे द्वारा रक्त का निस्यंदन होता है जिसे हम गुच्छ या गुच्छयी निस्यंदन कहते हैं
वृक्को द्वारा प्रति मिनट औसतन 1100 से 1200 मिली रक्त का निस्यदन किया जाता जो कि हृदय द्वारा 1 मिनट में निकाले गऐ रक्त के 1/5 भाग के बराबर होता है,गुच्छ की कोशिकाओं का रक्तदाब रुधिर का तीन परतों के गुच्छयी निस्यदन करता है
• उपकला
•बोमेन संपुट
•आघार झिल्ली
यह तीनों विशेष प्रकार के सजे होते हैं जिससे को छोटे-छोटे अवकाश बीच में रह जाते हैं इन्हें सिलटपोर कराते हैं इन झिल्ली से रुधिर इतनी अच्छी तरीके से छनता है कि जिससे रुधिर की प्लाज्मा की प्रोटीन को छोड़कर प्लाज्मा का शेष भाग छन्नकर संपुट कि गुहा मे इकट्ठा हो जाता है इसलिए इसे अल्ट्राफिल्ट्रेशन कहते हैं

Notes• एक स्वस्थ व्यक्ति में यह दर 125 मिली प्रति मिनट अर्थात 180 लीटर प्रतिदिन है

2• पुनः अवशोषण (ट्यूबलर पुनः अवशोषण)- प्रतिदिन बनने वाले निस्यदन के आयतन (180 लीटर प्रतिदिन) की उत्सर्जित मूत्र 1.5 लीटर है इसमें 99% निस्यदन को वृक्क नलिकाओं द्वारा पुनः शोषण किया जाता है जिसे हम पुनःअवशोषण कहते हैं

3• ट्यूबलर श्रवन- जब छन्नीत द्रव दूरस्थ कुंडलीत भाग में पहुंचता है तब उसे मूत्र कहते हैं या मूत्र-मूत्रनलिकाऐ से होते हुए मूत्राशय में जमा हो जाता है और समय-समय पर मूत्रमार्ग के छिद्र द्वारा बाहर निकाल दिए जाते हैं

Notes▪︎ मूत्र में अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल तथा जल का संतुलन बनाता है इसी प्रकार मूत्र का निर्माण होता है

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